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Monday 8 September, 2008
 09:35 | 21/Jan/2008 |  10 Comment(s)
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Swapna..

स्वप्न ....
अर्ध रात्रि मृदु शान्त धरा कुछ सिहरन करती पवन आज |
है चाह किसी से मिलने की सब भूल करूं मैं इंतजार ||
वह आएगी अब आएगी अब होगा मिलन प्रियतमा से |
यह धवल चाँदनी गाएगी जब होगा मिलन प्रियतमा से ||
वे मद मस्ताने अधर आज जब सोम सुधा बरसाएंगे |
मैं ही क्या यह व्योम मही सब मस्त मस्त हो जाएंगे ||
देख मोहने मुखड़े को सब दर्प चाँद का होगा चूर |
भार्या अनंग निज स्वामी को फिर ले जाएगी बहुत दूर ||
दामिनी सा दामन दमकेगा घनघोर घटाओं के नीचे |
फिर मोर मोरनी नाचेंगे , हो मस्त मस्त वासी वन के ||
वह लचक महासागर तरंग जब चपला गति से आएगी |
कैसे रोकूंगा अपने को हा महा प्रलय हो जाएगी ||
मैं सुध वेसुध हो जाऊँगा करके स्पर्श तेरे तन को |
कैसे वर्णित कर पाऊँगा फिर प्रथम महा आलिंगन को ||
बौराए अलि सा मैं पुनि पुनि मधु के मद में खो जाऊँगा |
तेरे नयनों के वारिधि में मैं बूँद तुल्य हो जाऊँगा ||
पर याद मुझे हर बार प्रलय के नॅव प्रभात भी होती है |
तूफान बंद जब होता है शीतल समीर ही बहती है ||
हर रिपु क़ा सकल प्रभाव छोड जब वह गौरी बन जाएगी |
नन्हेः मुन्ने की आभा मय वह द्विजन स्वांस कहलाएगी ||
नव मांस कठिन सुश्रूषा कर शत कोटि बज्र सा पाकर शूल |
ममता संचित नव जीवन दे वह जाएगी दुःस्वप्न भूल ||
शैशव किल्लॉरें मारेगा चाहूँ ओर चहँक छा जाएगी |
उस विधु वदनी के आँचल में माँ की ममता इठलायेगी |
इस अमिय रूप रस स्वादन को ललचाएंगे अगिनत अहीस |
उस छण को वर्णित करने में शरमाएँगे शत शत कवीश |||

यतेन्द्र कुमार पांडेय

Category: Poetry | Permalink