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Swapna..
स्वप्न .... अर्ध रात्रि मृदु शान्त धरा कुछ सिहरन करती पवन आज | है चाह किसी से मिलने की सब भूल करूं मैं इंतजार || वह आएगी अब आएगी अब होगा मिलन प्रियतमा से | यह धवल चाँदनी गाएगी जब होगा मिलन प्रियतमा से || वे मद मस्ताने अधर आज जब सोम सुधा बरसाएंगे | मैं ही क्या यह व्योम मही सब मस्त मस्त हो जाएंगे || देख मोहने मुखड़े को सब दर्प चाँद का होगा चूर | भार्या अनंग निज स्वामी को फिर ले जाएगी बहुत दूर || दामिनी सा दामन दमकेगा घनघोर घटाओं के नीचे | फिर मोर मोरनी नाचेंगे , हो मस्त मस्त वासी वन के || वह लचक महासागर तरंग जब चपला गति से आएगी | कैसे रोकूंगा अपने को हा महा प्रलय हो जाएगी || मैं सुध वेसुध हो जाऊँगा करके स्पर्श तेरे तन को | कैसे वर्णित कर पाऊँगा फिर प्रथम महा आलिंगन को || बौराए अलि सा मैं पुनि पुनि मधु के मद में खो जाऊँगा | तेरे नयनों के वारिधि में मैं बूँद तुल्य हो जाऊँगा || पर याद मुझे हर बार प्रलय के नॅव प्रभात भी होती है | तूफान बंद जब होता है शीतल समीर ही बहती है || हर रिपु क़ा सकल प्रभाव छोड जब वह गौरी बन जाएगी | नन्हेः मुन्ने की आभा मय वह द्विजन स्वांस कहलाएगी || नव मांस कठिन सुश्रूषा कर शत कोटि बज्र सा पाकर शूल | ममता संचित नव जीवन दे वह जाएगी दुःस्वप्न भूल || शैशव किल्लॉरें मारेगा चाहूँ ओर चहँक छा जाएगी | उस विधु वदनी के आँचल में माँ की ममता इठलायेगी | इस अमिय रूप रस स्वादन को ललचाएंगे अगिनत अहीस | उस छण को वर्णित करने में शरमाएँगे शत शत कवीश |||
यतेन्द्र कुमार पांडेय
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